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बुधवार, 25 दिसंबर 2019

विपक्षप्रिय राजनेता : अटल

अभी जब मैं ये आलेख लिख रहा हूं,उस वक्त देश में तनाव,खिंचाव के चरम बिंदु पर अवस्थित आक्रोशपूर्ण, हिंसक माहौल है,जहां लोग इतने संवेदना-शून्य हो गये हैं कि एक-दूसरे का खून करने पर उतारु हैं। मैं इस सारी  समस्याओं का जङ लोगों का अहंकारी स्वभाव,संवादहीनता और एक-दूसरे के प्रति पाला गया पूर्वाग्रह से ग्रसित घृणा को मानता हूं।आज के इस जहरीले माहौल में यदि हमें किसी चीज की सर्वाधिक उपयोगी है तो वो है आपसी सद्भाव और परस्पर इज्जत और लगाव और इस सभी गुणों के आदर्श पुरुष हैं अटल बिहारी वाजपेयी।जो किसी भी प्रकार के मनमुटाव,विरोध से उपर उठकर लोगों का अपार स्नेह और सम्मान करते थे।
मुझे याद है,जब 2006 के संसद के शीतकालीन सत्र में भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी(मार्क्सवादी)के बङे नेता और तत्कालिन लोकसभा अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी ने सदन में अनाज के बदले तेल घोटाला मामले के हंगामे में कुछ सरकारी कामकाज निपटा लिये।इससे खफा होकर रा.ज.ग. ने ना सिर्फ उनका बहिष्कार किया, बल्कि उन पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए पत्र भी लिखा।उस समय अटलजी रा.ज.ग. के अध्यक्ष थे,इसलिए पत्र में पहला हस्ताक्षर भी उन्हीं का था।पत्र में वाजपेयी के हस्ताक्षर देखते ही सोमनाथ भावुक हो गये।उन्होने तत्काल देने का फैसला किया।
इसकी सूचना मिलते ही वाजपेयी दौङकर चटर्जी के पास पहुंचे और उन्हें ये कहकर इस्तीफा देने के लिये रोक दिया कि उन्होने स्वेच्छा से नहीं बल्कि पार्टी लाईन के तहत पत्र पर हस्ताक्षर किये हैं।सोमनाथ ने कहा कि अगर वाजपेयी को उनके इमानदारी पर शक है तो वह पल भर भी पद पर नहीं रहना चाहते,तब अटल जी ने कहा कि निजी तौर उन्हें चटर्जी की इमानदारी पर कोई शक नहीं है।इसका खुलासा खुद सोमनाथ चटर्जी ने अपना कार्यकाल पूर्ण होने के कुछ दिन पहले किया था।
इतने संवेदनशील थे अटलजी,ये जानते हुए सोमनाथ चटर्जी धुर विरोधी पार्टी के हैं, उनके इस्तीफे से अपने पार्टी के सदस्यों का मनोबल उंचा ही होता लेकिन अपने मतभेद को मनभेद में नहीं बदलने दिया।उनसे संवाद करने में तनिक भी देरी नहीं की।निजी अहंकार को कतई आङे नहीं आने दिया। आज के इस विपरीत समय में हमारे समाज को अटलजी की ये संवेदनशीलता और निश्चल स्नेह सीखने लायक है।


सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

नज़र

हेल्लो ! फ़ोन किया था?
हाँ!
बोलो...
कुछ पूछना था!
जी महोदया कंप्यूटर जी हाज़िर हैं... पूछिये!

(गम्भीर आवाज़ में)
नज़रें पहचान लेते हो क्या?
नज़रें? थोड़ा हिंदी में बोलना फिर से।
हे भगवान !! अरे मैं कह रही हूँ की तुम्हे नज़रों से पता लग जाता है की कौन तुमसे प्यार करता है और कौन फ़रेब? 
अच्छा ऐसा! हम्म हाँ पहचान लेता हूँ, लगभग।
सीखा दो न मुझे भी।
अरे ये तजुर्बे से आता है, इसकी कोई rule book थोड़ी न है।
नही !! फिर भी सीखा दो please...
अच्छा? चलो ठीक है ! मिलते हैं आज।
ओके! राजीव चौक आ जाओ ।

मैं रास्ते भर परेशान रहा के इम्प्रैशन जमाने के चक्कर मे "हाँ सीखा दूंगा" बोल तो दिया, लेकिन उसको समझाऊं कैसे? मैं राजीव चौक पहुंच गया, उसको फ़ोन किया..
कहाँ हो?
आ रही हूँ 5 min और लगेंगे! तुम पहुंच गए?
हाँ पहुंच गया। सुनो CCD वाले साइड आना वहीं खड़ा हूँ।
Hello! कहाँ पे हो? नज़र तो नही आ रहे।
CCD के पास खड़ा हूँ, अच्छा सुनो एक बात!
क्या हुआ अब?
फ़ोन काटो और अपनी एक सेल्फी लो बिल्कुल अभी जैसी हो वैसी ही।
अजीब हो तुम, क्यों ले सेल्फी?
अरे बाबा लो तो सही कुछ बताना है।
अच्छा रुको लेती हूँ ।
हाँ hello! हाँ ले लिया सेल्फी। अब ? 
अब जब मैं आऊँ तो मेरे फ़ोटो भी click करना, चेहरा पसंद न आये तो बाद में डिलीट कर देना लेकिन अभी के लिए एक बार pic ले लेना ठीक है।
हे भगवान! हम पागल हो जाएंगे । क्या सब करना पड़ रहा है। चलो ठीक है कर लुंगी click.

(ऑटो चाहिए madam ऑटो) 
मेट्रो में ऑटो वाले नही आते पागल....

(उसने फ़ोन निकाल के मेरी फ़ोटो क्लिक की)
अब खुश! अब बताओ के तुम मिलने क्यों बुलाये और ये फोटो फ़ोटो क्या चल रहा है?
आओ सब बताता हूँ। तुमने पूछा था न के नज़रें कैसे पहचानते हैं।
हाँ, तो उसके लिए फ़ोटो क्यों लेना जरूरी था।
फ़ोन निकालो...
हाँ लाओ इधर फ़ोन....
नही यहीं से देखो।
अच्छा! ये देखो जो तुम्हारी सेल्फी है इसमें क्या नज़र आ रहा है?
मेरे मुह पे पिम्पल्स है, और पीछे से एक लड़का घूर रहा है बस यही नज़र आ रहा है।
अरे भैया! आंखों में क्या नज़र आ रहा है?
कुछ भी तो नहीं।
गौर से देखो, ये जो आंखें हैं ना ये किसी को ढूंढ रही है, और अगर समझ नहीं आ रहा तो बस याद कर लो क्योंकि ये बातें तज़ुर्बे से आती है।
चलो ठीक है मैं अभी याद ही कर लेती हूँ।
और अब ये देखो ये मेरी तस्वीर..
हाँ इसमें मुझे एक पागल आदमी नज़र आ रहा है।
हाँ मैं भी एक पागल इंसान को ही देख के हंस रहा था। इस फ़ोटो में मेरी आँखों मे जो है वो प्यार है....  हाँ मतलब ये प्यार वाली आंखें हैं।
(ये बोलते बोलते मैंने अपना हाथ उसकी हाथों पे रख दिया, और कैमरा भी खोल के बैठा था। उसने मेरे हाथों को हटा दिया।)

क्या हो गया?
(मुस्कुराते हुए उसने कहा के कुछ भी तो नही.... मैंने उसकी ये बोलते हुए तस्वीर ले ली।)

सुनो एक फ़ोटो भेज रहा हूँ, व्हाट्सएप चेक कर लेना, वो तस्वीर जिसकी भी है, उसकी आँखों मे फ़रेब है।
(मैं ये बोल कर निकल गया, क्योंकि मुझे मालूम था की वो मेरे अलावा किसी और की भी है।)

सोमवार, 12 अगस्त 2019

इंतज़ार

मैं - अरे झा जी आज कितनी भर्तियां हुई है?
अखिलेश झा - अरे बेटा कैसे हो ? कैसे आना हुआ ?
मैं - बस ऐसे ही गुज़र रहा था तो सोचा मिलता चलूँ !
अखिलेश झा- आज का दिन बड़ा अच्छा है, कोई भर्ती नहीं हुआ है आज, बहुत खुश हूँ मैं तो आज। 
मैं - क्या बात है वाह !!!!
 

"अरे क्या कर रहे हो इधर ले आओ सामान, हाँ रखो यहाँ पे " (सूट बूट में एक नौजवान वृद्धा आश्रम में अपनी माँ को लिए आता है  )

अखिलेश झा- लीजिये रंजन साहब, हो गया दिन ख़राब, आ गया एक और बेटा जिसकी नौकरी विलायत में लगी होगी। (झा जी ने ये बात बड़ी खीज में आ के बोला था )

"यहाँ का इंचार्ज कौन है ?" (उस नौजवान ने पूछा)
मैं हूँ इंचार्ज ! अखिलेश झा।

ये सुनते है वो नौजवान, झा जी की तरफ बढ़ा और बोला
"झा जी इनको कुछ दिन के लिए यहाँ रखना है, जब इनका visa लग जायेगा तो इन्हें भी ले जाऊँगा अपने साथ, बस तब तक के लिए यहाँ रख लेते आप तो..... "
अखिलेश झा- जी बिलकुल ! हमारा तो काम ही यही है।  आप वहां जाइये और पेपर्स पर sign  कर दीजिये।

"इतनी जल्दी में आज तक कोई अपनी माँ को छोड़ने नहीं आया था।  ये व्यक्ति अलग ही किस्म की हड़बड़ाहट में था मनो उसे जल्दी से सब कुछ खत्म करना हो।  उसकी आँखों में न माँ को छोड़ जाने का गम था न ही विदेश की नौकरी की ख़ुशी। बस एक हड़बड़ाहट थी उसमे। "
झा जी ने मेरी और देखा और बड़ी व्यंग्यात्मक हसी वाली नज़रों से मानो ये बोला हो की देखो तुम्हारी नज़र लग गई।


मैंने भी हाथ बता दिया और नीरजा दीदी को (जो की अभी अभी आई थी) उनको उनका कमरा दिखा दिया और बाकि माँ जो अपनी विदेश वाले बच्चों का इंतज़ार कर रहे हैं उन से मिलवा भी दिया।

झा जी पिछले 23 साल से यहाँ के इंचार्ज हैं, अब तो ये जेब देख कर पैसे गिन लें, इतना ज्यादा इनका तज़ुर्बा है।

मैं वापस अपने घर जाने लगा था तभी झा जी ने आवाज़ लगाई।  आवाज़ डरावनी थी।  शयद किसी का इंतज़ार ख़तम हो गया, वो जो कल बीमार थी, लगता है आज.......
मैं जब पंहुचा तो मेरा शक सही निकला।
"ये आंखें आज भी खुली रह गई बेटे के वापस आने के इंतज़ार में" मगर शायद नियति को यही मंजूर हो।
हमने बहुत कोशिश की तब जा कर उनके बेटे को फ़ोन लगा जिसने ये कह के बात टाल दी की उसको छुट्टी नहीं मिलेगी।
मैंने  हतास नज़रों  से झा जी के तरफ देखा, वो गुस्से में थे।
मैंने कहा "कोई इतना कैसे गिर सकता है, जो माँ को आग देने भी नहीं आना चाहता" |
"ये पेड़ के सूखे हुए पत्ते हैं साहब, ये सिर्फ गिर सकते हैं "
झा जी की इन बातों में उनके बरसों का तजुर्बा नज़र आता है और जो छुपा हुआ है वो है गुस्सा।



न जाने हर रोज कितने ही माँ बाप अपने ही घरों से बेघर हो जाते हैं।  इस उम्मीद में की उनकी बच्चों की जिंदगी का सवाल है। "वो आँखें हर पल इसी इंतज़ार में रहती हैं की न जाने कब उसका बेटा आएगा और उनको वहां से निकाल कर ले जायेगा" मगर 100 लोगों में से सिर्फ 3 लोग ही घर जा पते हैं बाकी सब की जिंदगी इंतज़ार में ही ख़त्म हो जाती है।

कभी अगर वक़्त मिले तो सोचियेगा की आपके माता पिता ने आपके लिए कितना किया है, और जब कभी ऐसा ख्याल आए तो अपने आप को अपनी औकात दिखा दीजियेगा शायद हौसले कमजोर पड़ जाएँ आपके।


गुरुवार, 25 जुलाई 2019

लकीर

वो कभी कभार अकेले में बैठ कर अपनी हाथों की लकीरों को लाचार हो कर निहारता रहता था।
"हाँ मिल गई!  यही तो वो लकीर थी। हाँ पंडित जी ने तो बोल था की अगर ये वाली लकीर जब आपस मे मिल जाएगी तब सब ठीक हो जाएगा। हाँ बस अब थोड़ा सा ही तो रहता है, कुछ दिन में ये बढ़ कर आपस मे मिल ही जाएगी। फिर सब ठीक हो जाएगा"।

पीठ पर  एक डंटा पड़ता है पीछे मुड़ कर देखा तो पुलिस वाला जोर जोर से चिल्ला कर कह रहा था, चलो निकलो यहां से!!!
पार्क में भीख मांगना मना है।

जब आपके न चाहते हुए भी आपको लगातार संघर्ष करना पड़े तो ये मत देखो के "कितना संघर्ष किया" ये देखो के कितना बाकी है।
"क्योंकि जब मंज़िल का पता लग जाता है तो रास्ते छोटे हो जाते हैं।"

रविवार, 28 अप्रैल 2019

चाँद का दीदार?

क्लास 9 बजे से थी। मैं 8.30 में बस स्टॉप आ गया, 8.15 वाली बस निकल चुकी थी,अच्छी बस थी,जल्दी पहुंचा देती थी, लेट तो था ही, सो जल्दी से दूसरी बस में चढा, बस लगभग खाली थी, कोलकाता में यह "चमत्कार" जैसा ही था, विंडो सीट पकड़ी, आँखे बंद की, ईयर फोन लगाए, AR REHMAN का तुम तक तुम तक लगाया, हाँ वही.. कुन्दन वाला.. और बस.. फील ले ही रहा था, कि बस ने ब्रेक मारी, इतनी जोर से ब्रेक क्यु मारते हैं, पता नहीं.. आँखे खुली,सामने देखा.. ब्लैक चस्मा.. पीली ड्रेस.. ब्लू स्टॉल.. स्टॉल से पूरा फेस ढका हुआ (बिल्कुल डाकू जैसे), बस आँखे बची थी, पर उसपे भी काला चश्मा चढ़ा था। एक नजर में तो लगा कि भाई है क्या ये.. कितनी सुंदर है। वो मेरे आगे वाली सीट पर बैठी, ठीक मेरे आगे, विंडो सीट .. स्टॉल हटाया, बालों से cluter हटाया, हाँ जो भी बोलते हैं उसको! क्लेचर या क्लचर,पता नहीं, बस हटाया उसको.. थोरा बालों को बिखराया, कुछ बाल मेरे भी हाथ पर आए, मैंने हाथ हटा लिया। जब से वो बस में आई थी एक अलग से खुशबू थी हर तरह, पता नहीं  यार कौन सा पर्फ्यूम था। मानो जैसे कि पूरा कोलकाता ही महक उठा हो। कलकत्ता में खाली बस, इतना सुहाना मौसम और ऊपर से ये पल, ऐसा लग रहा था मानो कोई ख़्वाब मुकम्मल हो गया हो। फिर उसने अपने बालों को एक साइड किया, एक बात जरा गौर करे! उसके गले पर कोई तिल विल नहीं था। मैं उसे देखना चाह रहा था, बस बार बार बाकी पैसेंजर के लिए रुक रही थी, चल रही थी, मेरे फ़ोन में गाना भी अभी तक बज ही रहा था, लेकिन अब ईयर फोन कान में नहीं थे। थोरी देर बाद साइड पर्स लटकाए कंडक्टर साहब आ गए, उन्होने बोला टिकिट। चुकी वो मेरे से एक सीट आगे बैठी थी, तो पहले उसी के पास गए, उसने 9 रुपए का टिकिट लिया, लेकिन अफसोस पता नहीं चल पाया कि उसे उतरना कहा है। अब चेहरे का दीदार करने के लिए या तो उसे सीट से उठ कर गेट तक जाना था, या मुझे, लेकिन मेरा तो स्टॉप आया भी नहीं था। बोहोत कोशिश कर रहा था कि एक दीदार हो सके। मैं बेताब था, मियां भाई के जैसे चांद को देखने के लिए, लेकिन वो भी ईद का चांद निकली, बहुत इंतेज़ार करवा रही थी.....
हाँ तो मैं कहाँ था ? उसने ₹9 का टिकिट लिया, मुझे जहां जाना था उसका भाड़ा 10 रुपये था, मुझे लगा कि चलो अच्छा है उसका टिकिट 9 का है और मेरा 10 का, तो वो ही पहले उतरेगी! वाह वो पहले उतरेगी! अब लग रहा था मानो खुद ये रूप दिख के ईडी देगा, दीदार तो शायद अब मुकम्मल लग सा रहा था, बस बार बार अलग अलग स्टॉप पे रुकते गयी। लोग चढ़ते उतरते गए। सुबह का वक़्त था, तो चढ़ने वाले लोग ज्यादा थे। मेरी एक नज़र घड़ी पर भी थी के कहीं ज्यादा लेट न हो जाऊं, बस धीरे धीरे अपने रंग में रंगने लगी, बस वाले ने आवाज लगायी, देखा तो मेरा स्टॉप आने वाला था। लेकिन वो अब तक बैठी ही थी, यार..! उसने तो 9 का ही टिकिट लिया था, मैंने तो 10 का, अच्छा अच्छा..! वो चढ़ी भी तो लेट से थी, यह कैसे भूल गया था मैं? ठीक Ranjhna के एक गाने तुम तक तुम तक, के लाइन (@##£@) के वक़्त ही वो चढ़ी थी, सोचा, चलो मैं ही चुपके से गेट से दीदार कर लूंगा, ये देखना भी तो जरूरी था कि सच मे वो ईद का ही चाँद है ना, मगर अफसोस बस अपने रंग में रंग चुकी थी, ढेर सारे ऑफिस के id कार्ड, स्कूल बैग, ऑफिस बैग के बीच से मैं अपनी नजरो को पार करना चाह रहा था, मेरी हालत उस football के खिलाड़ी के तरह की हो गई थी जिसको दूसरे पाले में घुस के सब से बचते बचाते एक goal करना होता है। oopps.. बस ने ब्रेक लगायी, मेरी नजरे अब भी पूरी शिद्दत से मेहनत कर रही थी, कि कंडक्टर भैया ने बोला " ki dada.. nambe ta na"।  उसे देख पाने के जद्दोजहद छोड़ के मुझे नीचे उतरना पड़ा। नीचे उतरते ही मैंने उस सीट की तरफ देखा, अरे..! यह पीली से ब्लू कैसे हो गयी? कोई 30-35 साल का व्यक्ति अपने ऑफिस की id कार्ड लगाए बैठा हुआ था। शायद मेरे बाद वाले स्टॉप ही उसकी स्टॉप है! बस फिर से कोलकाता की तरह तेज़ चलने लगी। अब क्योंकि भीड़ ज्यादा होती है तो शायद वो गेट पे चली गई होगी ताकि अगले स्टॉप पे दिक्कत न हो। एक मन हुआ कि बस से भी तेज़ दौर कर अगले स्टॉप पर चला जाऊ, दीदार तो हो जाए कम से कम मगर आप भूल गए! पहली लाइन.. चुकि मैं लेट था। तो जरा जल्दी जाना था, मैं बस को टक टक निहारते रहा जब तक उसके पीछे दूसरी बस नही आ गई, और वो बस दिखनी बंद हो गयी, चुकि लेट हो रहा था तो मैं उस बस को ज्यादा देर तक निहार भी नहीं पाया.. ट्वीट ट्वीट .. "class is reschedule at 11am.."