रविवार, 28 अप्रैल 2019

चाँद का दीदार?

क्लास 9 बजे से थी। मैं 8.30 में बस स्टॉप आ गया, 8.15 वाली बस निकल चुकी थी,अच्छी बस थी,जल्दी पहुंचा देती थी, लेट तो था ही, सो जल्दी से दूसरी बस में चढा, बस लगभग खाली थी, कोलकाता में यह "चमत्कार" जैसा ही था, विंडो सीट पकड़ी, आँखे बंद की, ईयर फोन लगाए, AR REHMAN का तुम तक तुम तक लगाया, हाँ वही.. कुन्दन वाला.. और बस.. फील ले ही रहा था, कि बस ने ब्रेक मारी, इतनी जोर से ब्रेक क्यु मारते हैं, पता नहीं.. आँखे खुली,सामने देखा.. ब्लैक चस्मा.. पीली ड्रेस.. ब्लू स्टॉल.. स्टॉल से पूरा फेस ढका हुआ (बिल्कुल डाकू जैसे), बस आँखे बची थी, पर उसपे भी काला चश्मा चढ़ा था। एक नजर में तो लगा कि भाई है क्या ये.. कितनी सुंदर है। वो मेरे आगे वाली सीट पर बैठी, ठीक मेरे आगे, विंडो सीट .. स्टॉल हटाया, बालों से cluter हटाया, हाँ जो भी बोलते हैं उसको! क्लेचर या क्लचर,पता नहीं, बस हटाया उसको.. थोरा बालों को बिखराया, कुछ बाल मेरे भी हाथ पर आए, मैंने हाथ हटा लिया। जब से वो बस में आई थी एक अलग से खुशबू थी हर तरह, पता नहीं  यार कौन सा पर्फ्यूम था। मानो जैसे कि पूरा कोलकाता ही महक उठा हो। कलकत्ता में खाली बस, इतना सुहाना मौसम और ऊपर से ये पल, ऐसा लग रहा था मानो कोई ख़्वाब मुकम्मल हो गया हो। फिर उसने अपने बालों को एक साइड किया, एक बात जरा गौर करे! उसके गले पर कोई तिल विल नहीं था। मैं उसे देखना चाह रहा था, बस बार बार बाकी पैसेंजर के लिए रुक रही थी, चल रही थी, मेरे फ़ोन में गाना भी अभी तक बज ही रहा था, लेकिन अब ईयर फोन कान में नहीं थे। थोरी देर बाद साइड पर्स लटकाए कंडक्टर साहब आ गए, उन्होने बोला टिकिट। चुकी वो मेरे से एक सीट आगे बैठी थी, तो पहले उसी के पास गए, उसने 9 रुपए का टिकिट लिया, लेकिन अफसोस पता नहीं चल पाया कि उसे उतरना कहा है। अब चेहरे का दीदार करने के लिए या तो उसे सीट से उठ कर गेट तक जाना था, या मुझे, लेकिन मेरा तो स्टॉप आया भी नहीं था। बोहोत कोशिश कर रहा था कि एक दीदार हो सके। मैं बेताब था, मियां भाई के जैसे चांद को देखने के लिए, लेकिन वो भी ईद का चांद निकली, बहुत इंतेज़ार करवा रही थी.....
हाँ तो मैं कहाँ था ? उसने ₹9 का टिकिट लिया, मुझे जहां जाना था उसका भाड़ा 10 रुपये था, मुझे लगा कि चलो अच्छा है उसका टिकिट 9 का है और मेरा 10 का, तो वो ही पहले उतरेगी! वाह वो पहले उतरेगी! अब लग रहा था मानो खुद ये रूप दिख के ईडी देगा, दीदार तो शायद अब मुकम्मल लग सा रहा था, बस बार बार अलग अलग स्टॉप पे रुकते गयी। लोग चढ़ते उतरते गए। सुबह का वक़्त था, तो चढ़ने वाले लोग ज्यादा थे। मेरी एक नज़र घड़ी पर भी थी के कहीं ज्यादा लेट न हो जाऊं, बस धीरे धीरे अपने रंग में रंगने लगी, बस वाले ने आवाज लगायी, देखा तो मेरा स्टॉप आने वाला था। लेकिन वो अब तक बैठी ही थी, यार..! उसने तो 9 का ही टिकिट लिया था, मैंने तो 10 का, अच्छा अच्छा..! वो चढ़ी भी तो लेट से थी, यह कैसे भूल गया था मैं? ठीक Ranjhna के एक गाने तुम तक तुम तक, के लाइन (@##£@) के वक़्त ही वो चढ़ी थी, सोचा, चलो मैं ही चुपके से गेट से दीदार कर लूंगा, ये देखना भी तो जरूरी था कि सच मे वो ईद का ही चाँद है ना, मगर अफसोस बस अपने रंग में रंग चुकी थी, ढेर सारे ऑफिस के id कार्ड, स्कूल बैग, ऑफिस बैग के बीच से मैं अपनी नजरो को पार करना चाह रहा था, मेरी हालत उस football के खिलाड़ी के तरह की हो गई थी जिसको दूसरे पाले में घुस के सब से बचते बचाते एक goal करना होता है। oopps.. बस ने ब्रेक लगायी, मेरी नजरे अब भी पूरी शिद्दत से मेहनत कर रही थी, कि कंडक्टर भैया ने बोला " ki dada.. nambe ta na"।  उसे देख पाने के जद्दोजहद छोड़ के मुझे नीचे उतरना पड़ा। नीचे उतरते ही मैंने उस सीट की तरफ देखा, अरे..! यह पीली से ब्लू कैसे हो गयी? कोई 30-35 साल का व्यक्ति अपने ऑफिस की id कार्ड लगाए बैठा हुआ था। शायद मेरे बाद वाले स्टॉप ही उसकी स्टॉप है! बस फिर से कोलकाता की तरह तेज़ चलने लगी। अब क्योंकि भीड़ ज्यादा होती है तो शायद वो गेट पे चली गई होगी ताकि अगले स्टॉप पे दिक्कत न हो। एक मन हुआ कि बस से भी तेज़ दौर कर अगले स्टॉप पर चला जाऊ, दीदार तो हो जाए कम से कम मगर आप भूल गए! पहली लाइन.. चुकि मैं लेट था। तो जरा जल्दी जाना था, मैं बस को टक टक निहारते रहा जब तक उसके पीछे दूसरी बस नही आ गई, और वो बस दिखनी बंद हो गयी, चुकि लेट हो रहा था तो मैं उस बस को ज्यादा देर तक निहार भी नहीं पाया.. ट्वीट ट्वीट .. "class is reschedule at 11am.."

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019

ज़िन्दगी?

कितना कमज़ोर हूँ न मैं। हर किसी पे चीखता चिल्लाता हूँ। कभी दोस्तों पे कभी घर वालों पे, कभी हालातों पे और कभी कभी तो अपने आप पे भी। इतना कमजोर हो गया हूँ कि अब डर लगने लगा है, की मेरी पसंदीदा चीज खो न जाये, कोई चुरा न ले। डर लगता है खुद को अकेला पा के। सहम जाता हूँ अपनी माज़ी और मुस्तकबिल को सोच के। ये बातें डरातीं है कि मेरे इस नाकामयाब जिंदगी के पीछे जो कुछ पोशीदा चेहरे हैं कहीं टूट के बिखर न जाये। इन्हीं खौफ की लार्ज़ीसों से भागता फिरता हूँ.....
कहीं दूर जा के अपने आप से ये कहना चाहता हूँ कि मैं निहायती कमज़ोर इंसान हूँ। ग़ुनाह करता फिरता हूँ, लोगों पर सवाल करता रहता हूँ।हारने का डर लगता है। हर चीज के बिखर जाने का डर लगता है। मगर इन तमाम मुश्किलों के बाबजूद मैं खड़ा सिर्फ इसलिए हूँ क्योंकि मेरे से कुछ उम्मीदें जुड़ी हैं। कुछ लोग हैं जो हमेशा मेरी जीत की कामना करते हैं। उन्हीं में से एक सख्स ने मुझ से कभी एक बात कही थी।
"मंज़िल तक पहुंचते-पहुंचते कभी ऐसा हो के, हिम्मत हार जाओ तो मुड़ कर पीछे देख लेना शायद आगे बढ़ने का हौसला मिल जाये"

सोमवार, 14 जनवरी 2019

समय

ये जो ज़िन्दगी है न एक चक्र में चलती, न उल्टी न सीधी बस कमबख्त गोल गोल ही घूमती है। ये वो बचपन, जवानी और बुढ़ापे वाला चक्र नहीं है, ये चक्र काल का है, उर्दू में वक़्त और तमीज से कही जाए तो समय। वो समय, जो फिरती है, और इसकी खासियत ये है, की इसकी भी कोई समय नही होती। और एक बात, ये वक़्त जो है इतिहास का गवाह भी होता है, (इसे फिल्मी न समझना बस निकल गया flow में)।
उसी "समय" से कुछ बात करनी थी, ( फ़िल्मी नही हो रहे हैं हम, भैया ) बात ये है के इस वक़्त के आगे किसी की चलती क्यों नहीं? न श्री कृष्णा की चली न राम जी की ( देखिए राम जी का नाम controversy के लिए नही कह रहे), न मोहम्मद की चली न ईसा मसीह की, गुरु गोविंद सिंह जी ने भी बहुत झेला ( देखिए "bhasha" secular है) सब के सब भगवान थे, चलो आपके लिए अल्लाह, किसी के GOD किसी के गुरु जी..... ये सब के सब भी वक़्त के चक्र में फसे थे, बुरे दिन देखे थे, भूखे रहे थे, बारिश में भींगे भी बर्फ में जमे भी लेकिन, झुकना पड़ा वक़्त के आगे ( सही बता रहे हैं, फिल्मी नही हुए हैं)...... 
ताने सुनने पड़े श्री कृष्णा को, जिनकी सुदर्शन पलक झपकते ही गाला उतार दे, मार्यादा पुरुषोत्तम पर नारी पर अत्त्याचार के आरोप लगे, अल्लाह के रसुल को भी यज़्ज़िद जैसे नीच इंसान ने घेरा था, अपनी साहिबजादों की कुर्बानी दी थी गुरु गोविन्द सिंह जी ने.....

ये सब भी वक़्त के आगे बेबस और लाचार थे ( इस बार फिल्मी हो गए हम) और वक़्त किसी के लिए नही रुकता हाँ ये बदलता जरूर है। 
अगर आप भी किसी मुशिकल में हैं, तो घबराइए नही, आपके पास खाने और रहने को तो है, और हाँ, दूसरों का दुख आपके दुख से बड़ा है । वक़्त की बात हो ग़ालिब न आये ऐसा हुआ है क्या (नही हुआ न तो आज भी नही होगा) 
" ए बुरे वक़्त !
ज़रा “अदब” से पेश आ !!
"वक़्त" नहीं लगता, 
वक़्त बदलने में।

बुधवार, 2 जनवरी 2019

मेरे भगवान!

अगले कुछ समय के लिए अपनी धार्मिक भावनाओं को जेब मे रहिएगा, हाथ जोड़ता हूँ 
"दृश्य पूजा घर का"
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"नमामि शमीशान निर्वाण रूपं,
विभुं व्यापकं ब्रम्ह्वेद स्वरूपं।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं।
चिदाकाश माकाश वासं भजेयम।...."
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जय जय शिव शंकर क्या हाल चाल, सब ठीक है, अरे हैं आप तो ठीक ही होंगें आपकी कौनसी मंदिर बननी है, वो पता लगा आपको राम जी का अरे वही जिन्होनें आपकी आराधना की  नमामि शमीशान... ये गा कर याद आया? आ ही गया होगा, जानते हैं शिव जी बड़े मुश्किल में हैं वो, और हनुमान जी पर भी आफत आन पड़ी है। भोले बाबा कुछ बोलिये!!!
अरे राम जी आप भी इधर ही बहुत दुख हुआ सुन के.... वो कह रहे थे कि वो आपका घर बनने वाले हैं अयोध्या में सुनिए न अगर कभी दिक्कत हो! मतलब जब तक घर न बने हमारे घर रह लीजिये! किराया लगेगा बताए दे रहे हैं! बस हर दिन इन सफेद कपड़े वालों को सद्बुद्धि देते रहना भगवान।
अरे अरे!! हनुमान जी आप कहे विष्नु जी के पीछे छुप रहे हैं, अरे क्या हुआ जाने दीजिये न, क्या आप भी? ये लोग तो रावण जैसे हैं भी नही जिनसे लड़ने के लिए आपको आना पड़े अरे ये जैसे हैं उस से 100 गुना बेहतर तो वो महाभारत का शकुनि था! गुस्सा थूक दीजिये और गदा को भी रख दीजिए इसे क्यों फोकट में गंदा करेंगे! 
आप सब बस इंतेजार कीजिये वक़्त के बीतने का, क्योंकि इन दानव की हत्त्य सिर्फ वक़्त के हाथों होना ही नियति है, क्योंकि काल चल के हमारे बच्चे इन्हें याद नही करने वालो वो तो उनको याद करेंगे जिन्होंने सच मे रामराज्य बनाने की कोशिश की थी, अरे राम जी याद है ना ?
श्री राम बोले " हाँ याद है"
"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी"

---पर्दा गिरता है---

सोमवार, 31 दिसंबर 2018

भरोसा

"खुदा ऐसे एहसास का नाम है,
रहे सामने और दिखाई न दे।"

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ये शेर बशीर साहब का है, अपनी खुदरंग शायरी के लिए बेहद मसहूर हैं।
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हर किसी के जिंदगी में एक वक्त आता है जब वो ये मानता है के भगवान जैसा कुछ होता नही है, फिर एक वक्त आता है जब हर बात पे भगवान याद आते हैं मतलब ये के हम इस बात से वाकिफ हो जाते हैं के कोई तो है जो हर एक चीज को उसके अस्तित्व से बंधे रखा है। इस बात का एहसास मुझे हो चुका था। हर अच्छे चीज में भगवान को शुक्रिया करता और जो कुछ बुरा होता उस से ये सोच के लड़ लेता के चलो एक नया अनुभव होगा, हरिवंश राय बच्चन की वो पंकिती की " मन का हो तो अच्छा और मन का ना हो तो और भी अच्छा, क्योंकि फिर वो भगवान के मन का होता है।" मैं इसी पे आंख मूंदे विस्वास करता था, और ये गलत भी नही है। 
मैं ये सब बातें कर क्यों रहा हूँ? क्योंकि आज साल के आखरी दिन जब एकांत में बैठे ये सोच रहा था की इस साल क्या बिगड़ा, क्या बना, क्या खोया और क्या हांसिल किया उसी दरमियान एक खयाल ये भी था की और सब साल के जैसे मैंने भगवान से ना तो कुछ मंगा और न ही उनको कटघरे में खड़ा किया जब भी कुछ गलत हुआ मेरे साथ। ये शायद आपके लिए बड़ी बात नही होगी पर ज़ेहनी तौर पे मेरा विकास हुआ है। मेरे जानने वाले जानते हैं के 2018 में एक ऐसा वाकया हुआ जिस से मैं पूरी तरह से टूट गया था, पहली बार उस इंसान को रोते देखा जिसने हमें कभी रोने नही दिया लेकिन इस मुश्किल में भी मैंने ऊपर वाले से शिकायत नही की क्योंकि मैं शायद पूरी तरह से उसे ठीक करने में लगा था, और यही बात मुझे समझनी थी आप सब को, कोशिश करो दोस्त ईश्वर, अल्लाह सिर्फ हौसले के लिए हैं।

नए साल की बधाई आप सबको, अपने ईश्वर को मत छोड़िएगा लेकिन सिर्फ उन्हीं के भरोसे भी मत रहिएगा। 
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" रास्ते में फिर वही पैरो का चक्कर आ गया,
जनवरी गुज़रा नहीं था और दिसम्बर आ गया..."
                                                  -Rahat Indoori
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