रविवार, 23 सितंबर 2018

थककर बैठ गये क्या भाई?

 दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा 
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा
 जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही
 अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छवास तुम्हारा
 और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है
 थककर बैठ गये क्या भाई? मंज़िल दूर नहीं है | 
                                                         -रामधारी सिंह दिनकर

इस अंक को  पढ़ने से पहले "अंतर " को पढ़िए |

मैंने पहले भी कहा था के संघर्षशील व्यक्ति अगर सफल होना चाहता है तो उसे  परिणाम का नहीं सोचना चाहिए | अगर कुछ सोचना ही है तो ये सोचना चाहिए के सफल होना कैसे है ?

1) जिज्ञासा (curiosity)-

अगर आप के अंदर ये गुण है तो इस  गुण में खुद को सिद्ध कर लीजिये क्यूंकि उत्सुकता अगर है तो कोई भी चीज सीखना मुश्किल नहीं हो सकता चाहे उम्र कोई भी हो | हमारी हिन्दू संस्कृति मे  उत्सुकता को बहुत बड़ा महत्वा दिया गया है | हमने देखा है के अर्जुन कितना उत्सुक था वो सब  जानने के लिए जिससे वो भयभीत था, और साथ ही साथ श्री  कृष्णा जो उत्तर देने में पारंगत थे | एक भयभीत इंसान की "जिज्ञासा" और उसका सवाल करना और तो और स्वयं भगवन का उत्तर देना बताता है के उत्सुकता में कितनी शक्ति है | अगर देखा जाये तो पौराणिक कथाओं में नचिकेता सब से जयादा उत्सुक बालक था जिसे स्वयं यमराज ने ज्ञान दिया और वापिस पृथ्वी पर भेजा था | 
लेकिन सिर्फ उत्सुक हो जाना सफलता की कुंजी नहीं है, उस उत्सुकता से पूछे गए सवाल का उत्तर ढूंढ़ने की आपकी भूख आपको सफल बनाएगी | 

2) धैर्य (patience)-

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
   
हमारी सबसे बड़ी समस्या, के हम धैयरवान नहीं हैं | जरा जरा सी हार पर थक कर बैठ जाते हैं | अटल जी की ये कविता मुझे प्रेरणा देती है डटे रहने की | हम सब सामान्य मनुष्य हैं और विचिलित होना हमारा स्वभाव है परन्तु इस स्वभाव का बुरा प्रभाव ना पड़े हमें अपने आपको धैयरवान बनाना होगा, और खुद को  धैयरवान बनाना खुद के ऊपर है| 

3) नेतृत्वा (Leadership)-

नेतृत्य की छमता हर किसी में नहीं होती, और बिना नेतृत्वा के सफलता मिल पाना उतना ही मुश्किल है जितना के नदी का उल्टा बहना | कुछ लोग तो ये भी कहते हैं के नेतृत्वा की छमता को विकसित भी नहीं किया जा सकता परन्तु मैं इससे सहमत नहीं हूँ मेरा मानना है के अगर आप चाहें और आपको मौका मिले तो आप भी एक अच्छे अग्रलेख बन सकते हैं |



ये 3 कुंजियाँ अगर आपके हाथों में हैं तो सफलता के द्वार पर लगा विशाल सा दिखने वाला वह ताला आसानी से खुल सकता है | 





शनिवार, 15 सितंबर 2018

अंतर

डर लगता है क्या ??? हार जाने का ? क्या कभी परेशान  हुए हो ? कभी ऐसा लगा है के "मुझ से नही हो पायेगा" ? अगर आप का जवाब हाँ है तो कोई डरने की बात नही है ये औसतन हर तीसरे व्यक्ति की परेशानी है । असल मे हम लोग परिणाम से नही डरते बल्कि डरते हैं तो उस परिणाम तक पहुंचाने के असहज रास्तों से । हम कदम उठाते भी नही हैं और कह देते हैं के "हम से ना हो पायेगा" । बस यही एक बारीक सा अंतर पैदा कर देती है "सफलता" और "असफलता" के बीच में । सफल व्यक्ति सफल इसलिए है क्योंकि वो न तो परिणाम का सोचता है और न परिणाम की प्रतीक्षा करता है, वो बस अपना काम करता रहता है। जिस व्यक्ति ने ये समझ लिया के उसका वश सिर्फ कर्म पर है उसके परिणाम पर नही, वो व्यक्ति सदा सुखी रहेगा इसलिए खुश रहिये  ।
क्योंकि असहज हो कर काम करने से बेहतर है के काम करे ही ना । तो अगर सफल होना है तो ये सोचना छोड़ दो के कहीं असफल न हो जाएं। असफल होने का एक मात्र कारण है असफलता का डर । हम कोई काम इसलिए करना नही चाहते क्योंकि डरते हैं के हमारी हार ना हो जाये पर ये नही सोचते के अगर जीत गए तो कितना कुछ बदल जायेगा। हम सब को फूल की तरह महकना तो होता है लेकिन शूलों से परेज भी रखना चाहते है। आगर जगमगाना है तो जलना भी होगा बिना ये सोचे के परिणाम क्या होंगे।

रविवार, 2 सितंबर 2018

मेरे हीरो

हीरो !!! एक ऐसा शब्द जिसको सुनते ही हमारे मस्तिष्क में अलग अलग व्यक्तियों के चेहरे सामने आने लगते हैं, कभी सलमान कभी अक्षय,लेकिन एक नाम है, जो मैं और आप भूल जाते हैं | आज किसी बच्चे को उठा कर पूछ लो के बेटा तुम्हारा हीरो कौन है ? तो वो पक्का कहेगा के सलमान है या आमिर है, या  किसी और actor का नाम ले लेगा | अगर पूछो के वो इतना पसंद क्यों है तो पता है वो बच्चे जवाब क्या देते हैं ? कहते हैं के "देखा नहीं कभी कैसे अक्षय कुमार एक साथ 10 गुंडों से लड़ता है, नहीं देखा क सलमान कितनी अच्छी गीत गाता है"| ये विडम्बना है हमारी के हम हीरो उसे मानते हैं जो असल में हीरो है ही नहीं, वो तो मात्र एक अभिनेता है मात्र ACTOR है जो पैसों के लिए कैमरे के सामने ये सब करता है, कभी गीत सुनता है कभी गुंडों को मारता है, परन्तु इन सब में एक इंसान छूट जाता है जो के सच्चे माएनों में हीरो है, मेरे और आप सब के "पापा" ! आपका तो पता नहीं पर मेरे हीरो जरूर हैं मेरे पिता जी | हाँ भले ही गाना अच्छा ना गाते हों, भले गुंडों से लड़ते ना हों भले ही छोटी छोटी बातों पे डर जाते हों पर मेरे हीरो मेरे पापा ही हैं |
क्यूंकि जब भी मैं परेशां हुआ हूँ, जब भी कोई निर्णय लेने में असमर्थ हुआ हूँ, पापा ने बड़ी मीठी आवाज़ में समझाया और रह दिखाई है | गुंडों से तो भिड़ते नहीं देखा पर मेरे लिए पुरे ज़माने से लड़ते देखा है उनको, और हाँ मुझ तक अपनी एक घाव तक का जीकर पहुँचने नहीं दिया | मेरे पापा थोड़े डरपोक हैं, मुझ से कहते हैं के नई जगह है किसी से लड़ाई मत करना, वो डरते हैं के वो नहीं होंगे तो शायद कुछ गड़बड़ न हो जाये | मेरे खर्चों का हिसाब लेते हैं, मेरी बेतुकी मांगों पर फटकार भी लगते हैं | जैसा हीरो करता हैं न फिल्मों में बिकुल वैसे ही वो मेरा ध्यान रखते हैं |  फिल्मों के हीरो और मेरे पापा में एक अन्तर है के फिल्मों में हीरो कभी हारता नहीं है, पर मेरे पापा हारते हैं ताकि उनके बच्चे खुश हो जाएँ और बच्चों से हार कर भी वो खुद को जीता हुआ मानते हैं |

बुधवार, 15 अगस्त 2018

आज़ादी ?

*स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं*
72 वां स्वतंत्रता दिवस, एक लंबा सफर तय किया है भारत ने, हार कर भी और हर हार को जीत में बदल कर भी। इस देश ने वो भी वक़्त देखा के जब एक छोटे कद और बड़े इरादे रखने वाले शास्त्री जी ने आदेश दिया तो लोगों से उसे आदत बना लिया, जब आवाज़ लगाई तो लाहौर तक सब डर गए, ये भी देखा कि एक महिला प्रधान कैसे बनती है और उसके निर्णय कितने साहसी होते हैं, ये भी देखा के इस देश के जवानों ने कैसे हर बार दुश्मन को धूल चटा दी, ये भी देखा के सब ने मिल कर सरकार बनाई, ये भी देखा के किसी दल को इतनी बड़ी बहुमत मिली हो, ये भी देखा के कैसे हम हिंदुस्तानी आपस में लाडे और कैसे एक दूसरे के लिए मददगार साबित हुए। लेकिन इन सब के परे एक चीज, जो इन सब से ऊपर था वो था हमारा देश भारत !!!

आज हर कोई हाथ में चाय लिए ये कहता है के यार इस देश का क्या होगा? कोई अपना निर्णय सुनता है तो कोई अपनी राय दे देता है लेकिन काम कोई नही करता है। क्योंकि हमें मतलब ही नही है। हमें सैनिक चाहिए लेकिन वो पड़ोसी के घर से हो तो बेहतर होगा, भगत सिंह चाहिए लेकिन अपना बेटा नही कोई और, हमें भरत चाहिए लेकिन उसके सामने शेर रखने से डरते हैं। हम डरते हैं इसलिए बेतुके सवाल करते हैं, और इन बेतुके सवालों के जवाब देने में सरकारों को मजा बड़ा आता है। आज 72 साल होने को आये लेकिन जो सबसे बुनियादी चीज है, पानी हम उस समस्या का निदान नही कर पाए। आज जरा सी बारिश हो जाये तो चलने में नही बनता, घुटनो तक पानी भर जाता है, लेकिन ये मुद्दे नही होते हमारे, हमे तो जाती का धर्म का झुनझुना दे दो हम उसे ही बजा कर खुश हो लेते हैं। अरे!!!  पानी का क्या है मिले न मिले लेकिन मंदिर तो वहीं बनेगा!!! देश भगत हैं लेकिन वन्दे माताराम नही बोलेंगे, और जो न बोल तो पाकिस्तानी!! ये अच्छा हिसाब है साहब। आज गौ माता को बचाने को गौरक्षक तो है लेकिन लेकिन अपनी माता और बहनों के सुरक्षा के नाम पर सिर्फ इतना ही है के "घर जल्दी वापिस आ जाना"। "वो हिन्दू है तो मुसलमान से नफरत करता ही होगा जी" , "मुस्लिम के मरने पे इतना बवाल क्यों?", "ये भी आतंकी है", " तो फिर ये लोग भी भगवा आतंकी है" ........ हम हिन्दुतानी लोग आज कल ऐसी ही मानसिकता पाले बैठे हैं, और फिर चाय के टपरी पे कहेंगे कि देश का हाल बुरा है जी।
आज़ादी का दिन है आज। लेकिन हम आज भी आज़ाद नही हैं, हम अपने सोच के ग़ुलाम हैं और ये सोच की ग़ुलामी कहीं हमे फिर से पराधीनता की ओर न ले जाए। सिवाए इसके के हम दूसरों पे उंगलियां उठाते रहे बल्कि एक नेक कदम उठाने की जरूरत है, हर किसी को पहल करने की जरूरत है। 
सोच बदलने की जरूरत है। याद रहे न हिन्दू खतरे में है ना मुस्लिम पे क़यामत आने वाली है, लेकिन अगर जो न सम्भले तो कहीं ये शेर सच न हो जाये जो कभी इक़बाल ने लिखा था

"वतन की फ़िक्र कर नादान मुसीबत आने वाली है,
तेरी बर्बादियों के मश्वरे हैं आसमानों में,
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदुस्तान वालों 
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में"

अब बात ये है के हिन्दुतान भी हमारा है और इसपे आने वाली मुसीबत भी, तो क्यों न साथ रह कर इनका सामना करें। एक मश्वरा ये भी के अपने प्रतिनिधियों से सवाल करें के उसने आपके लिए किया और आप उसे अपना कीमती मत क्यों दें। आज़ाद होइए दोस्तों अपनी सोच से तब जा कर कहीं आज़ादी का कोई मतलब बनेगा।
जय हिंद, वन्दे मातरं।

मंगलवार, 7 अगस्त 2018

मत चूको चौहान!

अरे नही!! मैं पृथ्वीराज चौहान की कहानी नहीं सुनाने वाला । मैं तो बस उस महान शासक की उपमा देना चाहता था, आज के मेरे भारत देश की पराधीन पत्रकारिता पे। मैं अक्सर ऐसी विषयों पर लिखता हूँ जो वक़्त के साथ धूमिल न हो जाये लेकिन, जो कुछ भी पिछले दिनों हुआ है, जिस तरह से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले "media" के जड़ों पर हमला हुआ है, जिस तरह कुछ पत्रकारों  एक private फॉर्म से सिर्फ इसलिए निकल दिए गए क्योंकि उनलोगों ने सच दिखाने की कोशिश की थी। मैंने सोचा कि अगर इस पर मेरी भी कलाम चुप रही तो क्या अंतर होगा मुझ मैं और उनमें जो मीडिया पर बेतुका लगाम लगाने की कोशिशें कर रहे हैं। आज सिर्फ दो तरह के चैनल रह गए हैं एक " भक्तों" के और एक "दुश्मनों" के । जो चैनल भक्तों के हैं अगर आप उसे देखो तो लगेगा के देश मे रामराज्य आ गया है ( रामराज्य को कृपया कट्टर हिन्दुत्व से न जोड़ें) । और जो अगर दुश्मनों के चैनल देख लिया तो लगेगा कि देश की हालत सीरिया से भी बुरी है, लेकिन जो असल हालात हैं वो इन सब से परे है, बस यही "सच" जो सच मे सच है, दिखाने की कोशिश की थी इनलोगों ने और अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। मैंने सुरुआत में कहा था के "मत चूको चौहान"  असल में मैं चौहान उसे कह रहा हूँ जो सत्ता के जंजीरों में जकड़े पड़े है, लेकिन एक आग है, के सुलतान की सुल्तानी को खत्म जरूर की जा सकती है, बस जरूरत है तो कुछ चन्दबरदाईयों की, और हिम्मत! डटे रहने की । ये जो आज सत्ता के घमंड में चूर हैं, जो अपनी ही जड़ों पर दीमक लगा रहे हैं, ये भूल गए हैं कि इन्हें सत्ता तक पहुँचा सकने वाली ये मीडिया ही है। इन्हें ये पता नही है कि सांप पलट कर काटता जरूर है। साथ ही साथ एक गुज़ारिश है आप सब से के उनको देखना बन्द करो जो गलत खबर फैलाते हैं, और एक अनुरोध है कि पत्रकारिता एक पवित्र पेशा है तो इसे पवित्र ही रहने दें।